रोशन छाँव कमरे की
मानो धूप दबे पाँव चली आई
आती हवा अहाते से
मानी फूलों को पीठ पर बैठा लायी
खिड़कियों से आती खेलों के आवाज़ें
मानो ज़िंदगी ख़ुद गेंद उठा लायी
रसोई से आती ख़ुशबूदार आवाज़ें
भूख ख़ुद मानो पसंद का कुछ बना लायी
आँखें बंद की जब इस दिखावटी बाज़ार में
तो फिर गाँव वाले घर की याद आई
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