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ग़ज़ल - ख़ुश रहा करो

                
                                                         
                            मानो अगर हमारा कहा ख़ुश रहा करो
                                                                 
                            
खिलता है तुमपे रंग-ए-ख़ुशा ख़ुश रहा करो

मैंने जब अपना हाल बताया तबीब को
पर्चे पे उसने मेरे लिखा ख़ुश रहा करो

ख़ुश रहने की हर एक वजह छीनने के बाद
उसने पुर-इंकिसार कहा ख़ुश रहा करो

दिन-रात जोड़ते हो मेरे कुफ़्र का हिसाब
थकते नहीं हो यार ख़ुदा! ख़ुश रहा करो

वो ख़ुश हुआ तो मुझको ख़ुशी ही नहीं हुई
और मैं ही उससे बोलता था ख़ुश रहा करो
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3 महीने पहले

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