शरद ऋतु की रात निराली, नभ में चंदा छाया है,
सोलह कलाओं से सजकर, पूर्ण सुधाकर आया है।
वर्षा की रिमझिम थमकर जब, धरती ने श्रृंगार किया,
शीतल चाँदनी ने आकर, जग को जैसे प्यार दिया॥
आश्विन मास की पूर्णिमा, युगों से पर्व मनाती है,
कृष्ण-भक्ति की पावन गाथा, इसकी महिमा गाती है।
ब्रज की पावन भूमि में जब, कान्हा ने मुरली बजाई,
गोपी सब कुछ भूल गईं, सुध-बुध अपनी बिसराई॥
कृष्ण ने रचा दिव्य महारास, प्रेम-भक्ति का रूप बना,
हर गोपी के हृदय में कान्हा, हर कण में भगवान बना।
यह केवल नृत्य नहीं था, आत्मा का परमात्मा से मिलन,
रास बना संसार के लिए, प्रेम-साधना का अनुपम क्षण॥
चंद्र-किरण में खीर सजाकर, खुले गगन के नीचे रखते,
लोक-मान्यता कहती इसमें, अमृत-कण चंद्रमा भरते।
दूध-चावल की मीठी खीर, बन जाती फिर शुभ प्रसाद,
बाँट मिठास सभी के मन में, देती प्रेम का संदेश खास॥
चंदा सिखलाता शीतल रहना, कृष्ण सिखाते प्रेम,
लक्ष्मी देतीं कर्म-साधना, संस्कृति देती नेम।
मन का तम जब दूर भगाओ, तभी पूर्णिमा सार्थक है,
अपने भीतर चाँद जला लो, यही पर्व की धारक है॥
मयंक की कलम पुकारे, इतना पर्व सिखाता है,
प्रेम, भक्ति, सेवा, सद्भाव से जीवन सुंदर बनता है।
चाँद गगन में पूर्ण खिले और मन भी हो उजियार,
शरद पूर्णिमा बन जाए फिर, मानवता का महापर्व अपार॥
-मयंकेश कुमार दुबे
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