आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कहीं डूब न जाये ये जीवन

                
                                                         
                            समय का पानी बहता है
                                                                 
                            
कहीं डूब न जाये ये जीवन
कालचक्र कि अग्नि है
कहीं जल न जाये ये मानव
अधर्म का पहिया चलता है
कहीं चला न जाये धर्म सारा
पृथ्वी की धरती टुट रही
कहीं ढह न जाये जग सारा
ईश्वर भक्ति खत्म हुई
कहीं खत्म न हो ये जग सारा
मासांहारी जीता है
कहीं मर न जाये ब्राह्मण बेचारा
आज का मानव रोता है
कहीं खत्म न हो ये. जल सारा
पापी मानव जीता है
मरता है देखो धर्मी बेचारा
मानव-मानव लड़ता है
विध्वंस न हो ये जगत सारा
कई धर्म तो बट गए है
कहीं बट न जाये युग सारा
-मयंक चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर