समय का पानी बहता है
कहीं डूब न जाये ये जीवन
कालचक्र कि अग्नि है
कहीं जल न जाये ये मानव
अधर्म का पहिया चलता है
कहीं चला न जाये धर्म सारा
पृथ्वी की धरती टुट रही
कहीं ढह न जाये जग सारा
ईश्वर भक्ति खत्म हुई
कहीं खत्म न हो ये जग सारा
मासांहारी जीता है
कहीं मर न जाये ब्राह्मण बेचारा
आज का मानव रोता है
कहीं खत्म न हो ये. जल सारा
पापी मानव जीता है
मरता है देखो धर्मी बेचारा
मानव-मानव लड़ता है
विध्वंस न हो ये जगत सारा
कई धर्म तो बट गए है
कहीं बट न जाये युग सारा
-मयंक चतुर्वेदी
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