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दहलीज़-ए-मोहब्बत

                
                                                         
                            तू ना जो हमसफ़र हो, तो बेरंग ये सफ़र हो,
                                                                 
                            
ना मंज़िल का पता हो, ना मोहब्बत का असर हो।

जो ना तेरा नाम निकले मेरे लबों से कभी,
ऐसी ना कोई दुआ हो, ना ऐसी कोई सदा हो।

जो ख़ुदा हो तो कभी ना तुझसे जुदा हो,
मोहब्बत की दहलीज़ पर तू ही मेरा ख़ुदा हो।

तेरे क़दमों की धूल को माना अपना नसीब है,
सारी ख़ुदाई छोड़ कर, बस तू दिल के क़रीब है।

इक पल जो तू ओझल हो, तो थम जाती है जान सी,
तेरा अक्स आँखों में आए, तो साँस ढलती है शाम सी।

तू ना जो हमनवा हो, तो बेमोल ये वफ़ा हो,
बिना तेरे जीना भी जैसे कोई सज़ा हो।

रूह की इस गहरी प्यास में तू ही सवेरा है,
ज़िन्दगी की कड़ी धूप में तू ही बसेरा है।

मेरा हर इक क़तरा अब तेरी इबादत करता है,
मेरा दिल बस तेरी चौखट पे सजदा करता है।

तू ना जो पास मेरे हो, तो वीरान हर सहर हो,
सूनी रहे ये राहें, ना रातों की ख़बर हो।

फ़ना हो जाएँ हम तेरे ही इस प्यार में,
मेरा वजूद मिट जाए तेरे इक़रार में।

जो ना तेरी याद घूमे मेरी साँसों के दरमियाँ,
तो वीरान हो जाए मेरे दिल का ये आशियाँ।

जो ख़ुदा हो तो कभी ना तुझसे जुदा हो,
मोहब्बत की दहलीज़ पर बस तू ही मेरा ख़ुदा हो।
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2 घंटे पहले

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