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विरह गीत ग़ज़ल

                
                                                         
                            तराने प्रेम के गाकर, सदा तुमको पुकारा है।
                                                                 
                            
न तड़पाओ मुझे माधव, नहीं अब ये गवारा है।
खड़ी हूँ ध्यान में कब से, दिवानी रो बुलाती है,
*चले आओ सखा माधव, तुम्हारी याद आती है।।*

हुई है अधखिली राधा, इश्क का रोग तड़पाता।
भरी पलकें ये कहती हैं, नहीं सावन मुझे भाता।
नहीं लगती सुहानी रुत, पुरानी रुत सुहाती है,
*चले आओ सखा माधव, तुम्हारी याद आती है।।*

दुखी है चाँद भी अब तो, कहाँ मचले फिजाएँ अब।
विरह की आग में जलती, चकोरी की सदाएँ सब।
टपकते नैन से आँसू, निशानी याद आती है।
*चले आओ सखा माधव, तुम्हारी याद आती है।।*

बुने थे ख़्वाब जो मैंने, सजाए आज भी रहती।
ज़माने की  निगाहों से, कहाँ राधा छुपी रहती।
चुनर ओढ़ी है धानी-सी, कहानी याद आती है,
*चले आओ सखा माधव, तुम्हारी याद आती है।।*
-मानसी मित्तल
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40 मिनट पहले

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