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प्रकृति का आईना

                
                                                         
                            जैसे सुबह की धुंध में लिपटे हुए पेड़,
                                                                 
                            
मानो कोई राज़ कहते हो चुपके से
जब सूरज की किरणें पड़ती हों पत्तों की बूंदों पर
जैसे हजारों हीरे जड़ देती हैं ॥

नदी का पानी भी आईना बन कर बहता है,
आसमान भी उसमें अपना चेहरा देखता है ॥
पेड़ों से हवा जब टकराती है,
तो पत्ते भी खुशी से गीत गाते हैं ॥

जब पवन की लहरें सरसराती हैं
तो जंगल में मधुर स्वर गूंज उठते हैं ॥
जब हवा चले तो पत्ते झूमें,
जैसे प्रकृति कोई राग छेड़े ॥

बरसात जब आती है तो मिट्टी भी महकने लगती है,
धरती का हर कोना-कोना भीग जाता है ॥
रात को आकाश में जब तारे टिमटिम करें,
तो मानो जैसे प्रकृति ने दिए जला रखे हों ॥

ना कोई शोर, ना भीड़ है यहां,
बस सन्नाटा फैला है चारों ओर

प्रकृति की खूबसूरती का इतना सा राज़ है,
जो देखे, वो खुद से मिल जाता है ॥

 
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3 महीने पहले

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