आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अल्फ़ाज हो तुम

                
                                                         
                            अल्फ़ाज़ हो तुम
                                                                 
                            

हो जीवन का आधार तुम ,
श्वास हो , शृंगार तुम ॥
नींद हूं मैं , हो ख्वाब तुम ,
सागर हो तुम , मैं तेरा किनारा ॥

प्रियवर भी हो , प्रियतम भी तुम ,
धड़कन में बसती कोई धुन हो तुम॥
लफ़्ज़ नहीं जो कह सकूं ,
बस वो एहसास हो तुम ॥

लिख सकूं न कभी जो ,
वो अल्फ़ाज़ हो तुम ॥
तेरी यादों में बीते हर लम्हा मेरा ,
तेरी हर बात छू जाए दिल को ॥

मैं अधूरी , मुकम्मल हो तुम ,
मेरे हर सांस की बस आस हो तुम ॥
अंधेरे में चांद की रोशनी जैसे हो तुम ,
मेरी हर खुशी का पैगाम हो तुम ॥

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर