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मन में बैर न पालिए

                
                                                         
                            रहिमन मन की पीर को, मन ही राखे तोय,
                                                                 
                            
सुनि सुनि बात बनइहैं सब,पीर न बाँटे कोय!

ऐसे रिश्ते राखिए, जो दिन रात सुहाय,
बरखा छतरी बनि रहें, धूपन छाँह धराय!

मन की पीर समझि लें, बिन बोले बतियाए,
रूठें तौ मनुहार करैं, मन की गाँठ खुलाय!

मन में बैर न पालिए, गाँठ न रखिए कोय,
क्षमा प्रेम की धार है, निर्मल मन फिर होय!

भीड़ की बात अब सब सुनैं, बीर की सुनै न कोय,
सबके अपने दर्द सुहाने, पर-दुख सुने न कोय!
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37 मिनट पहले

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