मेरे घर के दरवाज़े पे, खड़ी हो के मेरा इंतज़ार करो,
उचक्के ऐसे ही निहारो, ख़यालों में मुझे प्यार करो।
मन अकुलाया सा हो तनिक, नाहीं दिल को चैन हो,
मेरी आहट सुनने के ख़ातिर, खुद को बेकरार करो।।
साँझ ढलते दीपक जलते, चौखट पर तुम आ जाना,
पलकों पे सजा कर सपने तुम, राह मेरी तकते रहना,
चाँद उतर आये अँगना में, खुद का ऐसा श्रृंगार करो।
मेरे घर के दरवाज़े पे, खड़ी हो के मेरा इंतज़ार करो।।
पवन इतराये तो अंचरा से तुम, मेरा संनेशा पूछ लेना,
मेरे आने की बतकुचन, फूलों से भी तुम कर ही लेना,
उलझी साँसे संवारतें हुवे, खुद को तुम खबरदार करो।
मेरे घर के दरवाज़े पे, खड़ी हो के मेरा इंतज़ार करो।।
रात करवटों में गुजारते, जो नींद तेरी उचाट हो जाये,
यादों की चाँदनी में, सिलवटों में ही प्रभात हो जाये,
अधरों पे रटते हुवे नाम मेरा, नयनों से अभिसार करो।
मेरे घर के दरवाज़े पे, खड़ी हो के मेरा इंतज़ार करो।।
प्रत्यक्ष जब मैं द्वार पे आ जाऊँ, तुम सम्मुख मुस्काना,
नयनों में संचित सावन से, मनस ओत -प्रोत कर देना,
होजाऊँ तुम पर न्यौछावर मैं, तुम भृकुटि से वार करो।
मेरे घर के दरवाज़े पे, खड़ी हो के मेरा इंतज़ार करो।।
जिस चौखट ने राह तकी है, उस चौखट मिल जाएँ हम।
बेचैन प्रतीक्षा का होवे समर्पण, मुदित मन मुस्कायें हम।।
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