कब तक यूँ ही सिसकती रहेंगी ये बेटियाँ,
कब तक यूँ डर के साये में जियेंगगी बेटियाँ।।
हर मोड़ पर घात लगाए ये बैठे हैं दरिंदे,
कब तक यूँ घुट कर मरती रहेंगी ये बेटियाँ।
ममता की मूरत हैं, घर की रोशनी भी,
फिर क्यों? ऐसे बिखरती रहेंगी ये बेटियाँ।।
इंसाफ़ की चौखट पे आँसू लिए खड़ी,
कब तक यूँ तड़पती रहेंगी ये बेटियाँ।।
हैवानियत आज इंसान का चेहरा पहन चुकी,
कब तक अपने समाज में सहती रहेंगी ये बेटियाँ।
जिस देश में देवी कहकर सदैव पूजा जाता है,
क्यों आज वहीं यूँ झुकती रहेंगी ये बेटियाँ।।
अब वक़्त आ गया है हर हाथ सुरक्षा को बढ़े,
तब ही हर घर में मुस्कुराती रहेंगी ये बेटियाँ।।
कवि एम के सिंह की बस इतनी सी है इल्तिज़ा,
सम्मान से जब जी सकेंगी,तब खिलेंगी ये बेटियाँ।।
- एम के सिंह
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