आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ये बेटियाँ

                
                                                         
                            कब तक यूँ ही सिसकती रहेंगी ये बेटियाँ,
                                                                 
                            
कब तक यूँ डर के साये में जियेंगगी बेटियाँ।।

हर मोड़ पर घात लगाए ये बैठे हैं दरिंदे,
कब तक यूँ घुट कर मरती रहेंगी ये बेटियाँ।

ममता की मूरत हैं, घर की रोशनी भी,
फिर क्यों? ऐसे बिखरती रहेंगी ये बेटियाँ।।

इंसाफ़ की चौखट पे आँसू लिए खड़ी,
कब तक यूँ तड़पती रहेंगी ये बेटियाँ।।

हैवानियत आज इंसान का चेहरा पहन चुकी,
कब तक अपने समाज में सहती रहेंगी ये बेटियाँ।

जिस देश में देवी कहकर सदैव पूजा जाता है,
क्यों आज वहीं यूँ झुकती रहेंगी ये बेटियाँ।।

अब वक़्त आ गया है हर हाथ सुरक्षा को बढ़े,
तब ही हर घर में मुस्कुराती रहेंगी ये बेटियाँ।।

कवि एम के सिंह की बस इतनी सी है इल्तिज़ा,
सम्मान से जब जी सकेंगी,तब खिलेंगी ये बेटियाँ।।
- एम के सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर