बेदर्द था वो ,मेरे दर्द को पढ़ न सका कभी ,
मेरी आँखों में छिपा समंदर गढ़ न सका कभी।।
मैंने अपने हर एक साँस में उसका ही नाम लिखा,
वो मेरे इश्क़ का इक हरफ़ पढ़ न सका कभी।।
वफ़ा के फूल बिछाए थे हमने उसकी हर राह में,
मगर वो नफ़रतों से आगे बढ़ न सका कभी।।
दिल को खिलौना समझा, हँसकर तोड़ता रहा,
अपने गुरूर की दीवार से लड़ न सका कभी।।
मेरे आँसू भी उसके पत्थर दिल न पिघला सके,
उसका जमीर अपने भीतर जाग न सका कभी।।
जिसको मैंने ख़ुदा समझकर सजदे किए उम्र भर,
वो इंसानियत की राह पर चढ़ न सका कभी।।
अब उसके लौट आने की तमन्ना भी नहीं दिल में ,
जो एक बार गया, फिर मुड़ न सका कभी ।।
एम के सिंह' अब दर्द को ही अपना हमनवा मान बैठे,
बेदर्द दिलों का कोई चेहरा बदल न सका कभी।।
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