ज़ख़्म दिल के छुपाए तो ज़माना हँस पड़ा,
मुस्कुरा कर जो दिखाया, फिर फ़साना हँस पड़ा।।
जिसे अपना समझ बैठे , वही पत्थर हुआ ,
आईना सच बोल बैठा ,तो ज़माना हँस पड़ा।।
उम्र भर रिश्तों की ख़ातिर ख़ुद को मिटाता ही रहा,
जब ज़रा ख़ुद को सँवारा, हर बहाना हँस पड़ा।।
धूप में जलते सफ़र का दर्द किससे कह सकें,
छाँव माँगी एक पल की, आशियाना हँस पड़ा।।
दिल की दौलत बाँट दी मैंने बिना कुछ सोचकर,
हाथ जब ख़ाली हुए तो ख़ज़ाना हँस पड़ा।।
हमने सच की राह छोड़ी ही नहीं हर मोड़ पर,
झूठ जब ऊँचा हुआ, फिर ये ज़माना हँस पड़ा।।
'एमके सिंह यूँ ही मत आँक मेरी ख़ामोशियाँ,
वक़्त जब करवट बदलता है, ज़माना हँस पड़ा।।
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