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पत्थर समझ के जिसने मुझे यूँ ठुकरा..

                
                                                         
                            ख़ामोश था मगर मेरी नज़र बोलती रही,
                                                                 
                            
दिल की दबी हुई हर ख़बर बोलती रही।।

मैंने लबों को सी लिया, शिकवा नहीं किया,
आँखों की भीगी हुई लहर तो बोलती रही।।

जिनको यक़ीन था कि मैं बिखर जाऊँगा कभी,
मेरी अडिग-सी हौसला सफ़र सदा बोलती रही।।

रिश्तों के आईनों में धुआँ भर गया है बहुत,
फिर भी वफ़ा की हर डगर तो बोलती रही।।

पत्थर समझ के जिसने मुझे यूँ ठुकरा दिया,
सदा उसके लिए भी मेरी दुआ बोलती रही।।

कुछ लोग शोर करके भी कुछ कह नहीं सके,
आज मेरी ख़ामोशियों का असर बोलती रही।।

एमके. सिंह" अल्फ़ाज़ की ज़रूरत ही क्या पड़ी,
जब मेरी ख़ामोशी ही आज ग़ज़ल बोलती रही।।

 
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2 महीने पहले

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