आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नफरत कभी न सीखी मैंने..

                
                                                         
                            हम बेवफ़ा नहीं, ये फ़िज़ाओं से पूछिए,
                                                                 
                            
हर अश्क़ की कहानी वफ़ाओं से पूछिए।।

जिसने बदल लिए थे सफ़र बीच राह में ही ,
उसकी नई वफ़ा की अदाओं से पूछिए ।।

हमने तो उम्र भर तेरे उन वादों का मान रखा,
आप अपने जले हुए दिल की सदाओं से पूछिए।।

इल्ज़ाम तो हर दफ़ा ही हमारे ही नाम था,
सच क्या? है, टूटती हुई दुआओँ से पूछिए।।

रिश्तों की ये धूप - छाँव में जलते रहे हैं मगर,
नफ़रत कभी न सीखी मैंने,ये हवाओं से पूछिए।।

जिसको समझ रहे थे हम मुकद्दर की रौशनी ,
आज वो ही हमारे घर का दिया बुझा गया।।

अब भी दुआ में उसका ही चेहरा उतरता है,
दिल की अजब ये रीत है, ख़ुदा से पूछिए ।।

"कवि एमके सिंह" का यही है यक़ीन आज भी,
हम बेवफ़ा नहीं, ये ज़माने वालों से पूछिए।।
-एम के सिंह
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर