हम बेवफ़ा नहीं, ये फ़िज़ाओं से पूछिए,
हर अश्क़ की कहानी वफ़ाओं से पूछिए।।
जिसने बदल लिए थे सफ़र बीच राह में ही ,
उसकी नई वफ़ा की अदाओं से पूछिए ।।
हमने तो उम्र भर तेरे उन वादों का मान रखा,
आप अपने जले हुए दिल की सदाओं से पूछिए।।
इल्ज़ाम तो हर दफ़ा ही हमारे ही नाम था,
सच क्या? है, टूटती हुई दुआओँ से पूछिए।।
रिश्तों की ये धूप - छाँव में जलते रहे हैं मगर,
नफ़रत कभी न सीखी मैंने,ये हवाओं से पूछिए।।
जिसको समझ रहे थे हम मुकद्दर की रौशनी ,
आज वो ही हमारे घर का दिया बुझा गया।।
अब भी दुआ में उसका ही चेहरा उतरता है,
दिल की अजब ये रीत है, ख़ुदा से पूछिए ।।
"कवि एमके सिंह" का यही है यक़ीन आज भी,
हम बेवफ़ा नहीं, ये ज़माने वालों से पूछिए।।
-एम के सिंह
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