बेवफ़ाई का ज़हर जब रूह में उतर गया ,
ज़िंदगी का हर सुनहरा ख़्वाब भी बिखर गया ।।
जिसको अपना मानकर सजदे किए उम्र भर,
आज वो ही मेरा हमसफ़र, राहों से मुकर गया।।
आँसुओं ने रात भर तकिए से बातें कीं बहुत,
दर्द तो चुप था,पर मेरा हर ज़ख़्म फिर उभर गया।।
उसके वादों की इमारत रेत पर ही थी बनी ,
एक झोंका क्या चला, सब कुछ वहीं बिखर गया।।
अब किसी चेहरे पे जल्दी ऐतबार आता नहीं,
दिल तो पहले ही किसी धोखे से डर गया ।।
वो गया तो ले गया मुस्कान भी होंठों की ,
घर तो बाकी रह गया, लेकिन घर-सा घर गया।।
एमके सिंह' दर्द को अशआर में ढलने दिया मगर,
जो ग़ज़ल बनकर उभरा , दिल उसी में मर गया।।
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