आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हमारे ज़ख्म ही हमको आज..

                
                                                         
                            कभी आँखों से,कभी ख़ामोशियों से बात होती है,
                                                                 
                            
मोहब्बत जब मुकम्मल हो,तो यूँ शुरुआत होती है।।

छुपाकर दर्द सीने में जो हर पल मुस्कुराता है,
उसी इंसान के हिस्से बड़ी सौग़ात होती है ।।

न दौलत,न ही शोहरत आदमी की शान होती है,
ज़माने में तो बस उसके बड़े जज़्बात होती है।।

यहाँ चेहरे बदलते हैं मौसम की तरह अक्सर,
मगर किरदार से ही हर किसी की जात होती है।।

जो सच के साथ चलता है, वही तनहा भी रहता है,
मगर उसके क़दम पर ही ख़ुदा की नज़रात होती है।।

हमारे ज़ख़्म ही हमको आज हुनरमंद बना बैठे,
जहाँ ठोकर मिली ही , वहीं से नई उड़ान होती है।।

'एमके सिंह' झुकाकर सिर जीना हमें मंज़ूर कब था,
हमारी शायरी तो बस ज़मीर की आवाज़ होती है।।
- एम के सिंह
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर