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दरगुज़र करते रहे

                
                                                         
                            तेरी हर बेरुख़ी को भी दरगुज़र करते रहे,
                                                                 
                            
दिल के टूटे आईनों को हम हुनर करते रहे।।

तूने हर मोड़ पर हमको अकेला छोड़ दिया,
हम तुझे अपनी दुआओँ में, मगर करते रहे।।

ज़ख़्म गहरे थे मगर होंठों पे शिकवा न आया,
दर्द को हँसकर हमेशा ख़ुशनज़र करते रहे।।

जिसने तोड़ा था भरोसा, वही अपना भी था,
इसलिए हर फ़ैसला हम दरगुज़र करते रहे।।

नफ़रतों ने लाख कोशिश की मिटाने की हमें,
हम मोहब्बत की शमा को उम्र भर करते रहे।।

अब न उम्मीद -ए-वफ़ा है, न कोई गिला रहा,
दिल को बस सब्र की दौलत से हम भरते रहे।।

कवि"एमके सिंह"यही रिश्तों की इबादत है सनम,
जो भी अपने थे, उन्हें दिल से दरगुज़र करते रहे।।
- एम के सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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