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आँखे ही सच बोल गयी..

                
                                                         
                            आँखों में इक समंदर था, पर होंठों पर चुप्पी थी,
                                                                 
                            
जिसको दुनिया हार समझी, वो भीतर की शक्ति थी।।

आँखें ही सच बोल गईं,जब लफ़्ज़ बदलते रहते थे,
उनकी ख़ामोशी में जाने कैसी गहरी भक्ति थी।।

काजल,आँसू,ख़्वाब,उजाले,सबका अपना रंग रहा,
इन आँखों की दुनिया में, हर मौसम की हस्ती थी।।

कुछ चेहरे तो वक़्त के संग धुंधले होकर खो भी गए,
पर आँखों में जो बस जाए,उसकी अलग ही बस्ती थी।।

जब-जब दिल ने दर्द छुपाया,आँखों ने इकरार किया,
इनकी नमी बता रही थी, कोई अधूरी हस्ती थी ।।

आँखें केवल देखने का साधन भर होतीं तो क्या,
इनमें प्रेम , विरह , उम्मीदों की पूरी एक सृष्टि थी।।

जो भी पढ़ पाया आँखों को,दिल तक उसका रास्ता था,
वरना दुनिया भर की बातें, केवल शब्दों की सस्ती थीं।।
- एम के सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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