हम तो, अपने ही साये से,दूर खड़े हैं,
जब जब वक्त मिला,वक्त से ही लड़े हैं!
ठोकरें मिले,ताने मिले, रंजिश मिली,
देख ले जहां हमें,जिस हाल में पड़े हैं!
उठायी थी लाश हमारी, जिन्होंने कभी,
खिदमत करने हमारी,जिद पर अड़े हैं!
वो पत्थर हमे आज भी तलाशते हैं
जिन्हें तराशकर हमने मोतियां जड़ें हैं!
सब कुछ भूलकर हम आगे बढ़ गए
अब क्या उखाड़ना,जो मुर्दे गड़े हैं!!
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