पत्थर का दिल था तोड़ दिया सोंच समझकर,
मंदिर बनाऊंगा इसे अब , प्यार से गढ़कर!
तुम रोज मेरी राह में, कंकड़ जो बिछाए,
हांथों से उठाया हूँ सभी, फूल समझकर!
तुम जब भी मेरी रात में, बेचैनियाँ दोगे,
हर सुबह दिखाऊंगा तुम्हें,कुंदनी मंजर!
एक बार तुम भी चलो, जरा मेरी राह,
पीछे पीछे आऊंगा फिर, तुम्हारी डगर!
"समदिल" हैं कभी भी, हमें संगदिल न समझना,
सबके लिए सम्मान का है, दिल में समंदर!
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