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अड़ी हो क्यूं ज़िद पर अभी भी

                
                                                         
                            अभी भी गुनहगार हूं मैं
                                                                 
                            
आज तक ये नकारा नहीं है
तुम्हें तब भी स्वीकारा नहीं था
और अब भी स्वीकारा नहीं है।

चांद में चांदनी की लड़ी है
पर ज़माने की बदरी घनी है
रौशनी में नहाने की ख्वाहिश
लोगों को गंवारा नहीं है।

देख पहली नजर मुस्कराना
प्यार की वो कोई बात ना थी
ऐसी दौलत में क्या हक जमाना
जो कभी भी हमारा नहीं है।

अड़ी हो क्यूं ज़िद पर अभी भी
रोक लो और मना लो दिल को
सौंप दूं कैसे तुमको कि ये दिल
जो अब भी तुम्हारा नहीं है।

एकतरफा मोहब्बत तुम्हारा
जिंदगी में जहर घोल देगी
इसलिए बात मानो हमारी
दिल ने तुमको पुकारा नहीं है।।
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3 घंटे पहले

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