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निर्झर हूं

                
                                                         
                            हूं निर्झर निर्बाध
                                                                 
                            
चाहूं जैसी वेग धरूं

निश्छल- निर्मल -चंचल
पल -पल,कल-कल,छल-छल
हर पल अविचल उच्छल
रख अनवरत भाव अटल
छटा में मधुमय गीत भरूं।

श्वेत ओढ़नी लहर सी
पवन झकोरे संग झूलूं
ललचाऊं सब कोमल मन को
चाहे जैसी चाल चलूं
गरजूं जब तल में गिरूं।

ताल मिलाकर अपनी लय में
गीत गाकर अपनी लय में
मनहरणी सुखकरणी तरणि
नृत्य निभाकर अपनी लय में
वन -वन में संगीत भरूं।

नीरव निशा की शून्य ध्वनि में
सकल जीव जग बंद नयन
जगे जगे बिन नींद नयन
करूं निरंतर ध्वनि गर्जन
वन- जीवन सचेत करूं।

आओ! चांद, सितारों आओ!
देख हमें तुम ना ललचाओ!
उजली -उजली शुभ्र रात्रि में
भांति हमारे सब झूम जाओ!
तुम्हें पुकारूं जिद्द करूं।

सौर -रश्मि की धवल चमक से
स्पर्धा करके इतराऊं
सतरंगी इंद्रधनुष को अपनी
फूहारों पर लटकाऊं
नहीं किसी से तनिक डरूं।।
-मनोज कुमार सोनवानी 
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2 महीने पहले

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