नींद भी जितना मिला, उधार में मिला,
प्यार का खजाना तो, तकरार में मिला!
एक परिंदा जो उड़ा, आसमान में,
मंजिल तो उसे पंखों की, रफ्तार में मिला!
इक चोट जिसे हमने सम्हाला था सीने पर
वो अजनवी के, सदके- इंतजार में मिला!
इक फूल मिल गया था हमें राहे- सफर में,
हमने समझ लिया कि, वो बहार में मिला!
कश्ती में मौसिकी का इक तरंग जो उठा,
मांझी के सूझबूझ व पतवार में मिला!
"समदिल" तुम्हें है जितनी भी जीने का तजुर्बा,
पांवों में चुभे काटों के करार में मिला!!
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