शहर में इक तूफान आया है,
जद में राजा का मकान आया है।
न जाने कब दरारें दिवारों पर पड़े
जलजला,करते हुए हैरान आया है।
बदल जाएंगे,नियत जो बिगड़ी थी,
वो हाथ, पकड़ने को, गिरेबान आया है।
चिंगारी जो दबी थी,बूझी राख में
बनकर आग,राहे - निशान आया है।
राज और नीति के बीच का छल
समझाने ,युवा दल,ठान आया है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X