लिखने का मन करता है कि
एक शब्द में पुरी दुनिया लिखूँ
आंख बंद कर किया कल्पना
"माँ" के सिवा और क्या लिखूँ!
ममता की मूरत, समता- सूरत
दया- करूणा की रीत का संगम
सांसों से स्नेह- सुरभि का वितरण
त्याग- तप का दरिया लिखूँ!
अपनी लहू के सूक्ष्म अंश से
अपनी ही कोंख के अंदर
नवजीवन का सृजन करती
ईश्वर लिखूँ या विधाता लिखूँ!
धरती ,गगन ,चांद और तारे
जल ,अग्नि ,हवाएँ, दिशाएं
सबके सब इक आंचल में हैं
इससे ज्यादा अब क्या लिखूँ!
अपनी अंश की स्याही से जिसने
मुझमें सभी ज्ञानेंद्रियाँ लिखी
मेरा सारा जीवन लिख दिया
उस "माँ" पर अब मैं क्या लिखूँ!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X