आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बरौनियां छेड़ गई

                
                                                         
                            बरौनियां छेड़ गई,
                                                                 
                            
दूर गगन से आती बूंदें
टूट गई, तुम्हें एकटक देखते रहने की ख्वाहिश!

भीगे- भीगे केशुओं से
झरती, एक पतली सी सावन
बरसा रही है, प्रियतम की प्रणय -बारिश!

धुलती जा रही होंठों की
उबटन की गहरी लाली
दिल कर रहा है, तुमसे एक नयी गुजारिश!

तुम मुझमें पूरे भीगे हो
मैं तुममें पूरी भीगी हूं
ये सावन चाहे कर ले,कितनी आजमाईश!

बस, यूं ही भीगना चाहती हूं
तुम्हारी, बाहों की नर्मियों में
सजना! सुन लो, इतनी सी फरमाइश!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर