बरौनियां छेड़ गई,
दूर गगन से आती बूंदें
टूट गई, तुम्हें एकटक देखते रहने की ख्वाहिश!
भीगे- भीगे केशुओं से
झरती, एक पतली सी सावन
बरसा रही है, प्रियतम की प्रणय -बारिश!
धुलती जा रही होंठों की
उबटन की गहरी लाली
दिल कर रहा है, तुमसे एक नयी गुजारिश!
तुम मुझमें पूरे भीगे हो
मैं तुममें पूरी भीगी हूं
ये सावन चाहे कर ले,कितनी आजमाईश!
बस, यूं ही भीगना चाहती हूं
तुम्हारी, बाहों की नर्मियों में
सजना! सुन लो, इतनी सी फरमाइश!
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