अपनी अपनी पीड़ा, लोग अपनी तरह सुनाते हैं,
जिनको जितनी समझ आती है, उतनी दवा पिलाते हैं।
योग्यता बिकने लगी है, शिक्षा के बाजार में,
जिनकी जितनी है क्षमता,वो उतना ले जाते हैं।
बड़े भोले भाले हैं, सियासत के शिक्षार्थी,
जिधर माल सस्ता मिला ,उधर ही चले जाते हैं।
शासन और प्रशासन के इस बाजारू खेल में
मां - बाप के जीवन की, पसीने तक सूख जातें हैं।
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