आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अदावतें, नकाब

                
                                                         
                            अदावतें, नकाब सब है ज़माने में,
                                                                 
                            
निकलते हैं जब सभी इस पैमाने में।

शाम से ही दरिया उफान पर है,
ऐसे में ठहरते नहीं किनारों में।

ज़िन्दगी भी ख्वाहिशों का ही असर है,
यादें उंसिय्यत रंज सब है इस पिटारे में।

हर मुश्किल फ़ौक़ियत मुकद्दर से ही उलझा हर कोई,
फिर मिटा हर तिलिस्म जब पहुंचे मसाने में।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर