अदावतें, नकाब सब है ज़माने में,
निकलते हैं जब सभी इस पैमाने में।
शाम से ही दरिया उफान पर है,
ऐसे में ठहरते नहीं किनारों में।
ज़िन्दगी भी ख्वाहिशों का ही असर है,
यादें उंसिय्यत रंज सब है इस पिटारे में।
हर मुश्किल फ़ौक़ियत मुकद्दर से ही उलझा हर कोई,
फिर मिटा हर तिलिस्म जब पहुंचे मसाने में।
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