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क्यों अंत समझकर

                
                                                         
                            खेल नहीं था
                                                                 
                            
जिंदगी थी
फिर क्यों कभी
कद्र नहीं की

व्यवधान था
अवसान नहीं था
क्यों अंत समझकर
इंतिहा की थी।
-मं शर्मा 
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एक घंटा पहले

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