जब पेट की आग भड़कती है
पानियों से भी नहीं बुझती है
जान हथेली पे रख चलता हूँ
यूँ ही तालियाँ नहीं मिलती हैं
तुमने करतब मान कर देखा
मैं काम समझ कर करता हूँ
कर्मों के लेखे जोखे से कभी
निर्धन को रिहाई नहीं मिलती है।
-मं शर्मा
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