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क्रमशःऔचित्य खो रहा हूँ।

                
                                                         
                            रंग थोड़ा बदल रहा है
                                                                 
                            
धुंधला सा पड़ रहा है
वक्त के साथ चित्र भी
अपनी चमक खो रहा है

मैं तो फिर इंसान हूँ
जीवन से हलकान हूँ
मैं कैसे निष्प्रभाव रहूँ
क्रमशःऔचित्य खो रहा हूँ।
-मं शर्मा 
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1 सप्ताह पहले

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