बरस जाता है
बादल बरबस
गरज गरज कर भी
जानता है तृप्त होगी
प्रकृति उसके
निर्मल जल से ही
सह लेती है धरा
सीने पर
कुठाराघात भी
जानती है उपजेंगी
जीवन की कोपलें
उसकी कोख से ही।
-मं शर्मा
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