मन कि बातें मन तक रखो
सब को मत बतलाओ
कोई नही किसी का यहाँ
सब पर मत विश्वास बनाओ
रोग दोष और गरीबी सब यहाँ अपने है
रोकर दुख अपना मत किसी का जता ओ
अपना बनकर छलते है सब
इन लोग सें बच जाओ
अपने मन कि व्यथा को बस अपने मन को बताओ
रोकर पूछते है सब हसकर उड़ाते है
बात हमारी वो सारे मेँ फैलाते है
अपने दर्द पर मरहम खुद ही लगाओ
मन कि बातें मन तक रखो सबको मत बतलाओ,,,
-मंजू आस्था
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X