आंखों के पानी से पूछो, दुख कितना ठेला जाए ?
व्यथित व्यथा मौन से पूछे, कब कितना बोला जाए ?
प्रतिष्ठा के आकाश में, लाचारी का सूरज ढलता
आहत मन का पंछी पूछे, किस शाखा बैठा जाए ?
जीवन,मूल्य चीख रहे हैं,भावों के भी भाव जगे
बोझिल-से विश्वास ने पूछा, कब तक और छला जाए?
गूंगी-बहरी मानवता पूछे, मानव धर्म की परिभाषा
जाति-धर्म के बादल पूछें, कब किस पर बरसा जाए ?
नफरत की दीवार तोड़कर,मन से मन के तार जोड़कर
पथिक -प्रेम रस्ते से पूछे, किस ठौर ठहरा जाए ?
=मंजू
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