ख्वाबों का हर एक शजर सूखा पड़ा है,
मेहनत का हर कतरा भी अब थका पड़ा है।
हुनर जो हाथों में चमकता था कल,
आज फर्श पर बिखरा, बे-सिला पड़ा है।
अरमानों की तामीर अधूरी है यार,
दिल के हर कोने में है एक इंतजार।
दस्तूर-ए-दुनिया में काम की है तलाश,
पर हर दरवाज़ा बंद, हर राह है उदास।
बाज़ारों में सन्नाटा, चेहरों पे गर्द,
हर तरफ मायूसी, हर दिल में दर्द।
कौन सुनेगा यहां मेरी फ़रियाद,
कौन देगा मेरे हिस्से का इमदाद?
कभी सोचा था, आसमानों को छुएंगे,
आज ज़मीन पर बेमकसद बैठे हुए हैं।
खुदा से बस यही एक इल्तिजा है,
इंसान की मेहनत को न जाया कर, ऐ खुदा!
काम दो, हुनर को पहचान दो,
इन बेकस नौजवानों को उड़ान दो।
बेरोज़गारी के अंधेरों में एक चिराग़ जले,
हर घर में मेहनत की महक बसे।
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