आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बेरोजगारी का आलम

                
                                                         
                            ख्वाबों का हर एक शजर सूखा पड़ा है,
                                                                 
                            
मेहनत का हर कतरा भी अब थका पड़ा है।
हुनर जो हाथों में चमकता था कल,
आज फर्श पर बिखरा, बे-सिला पड़ा है।

अरमानों की तामीर अधूरी है यार,
दिल के हर कोने में है एक इंतजार।
दस्तूर-ए-दुनिया में काम की है तलाश,
पर हर दरवाज़ा बंद, हर राह है उदास।

बाज़ारों में सन्नाटा, चेहरों पे गर्द,
हर तरफ मायूसी, हर दिल में दर्द।
कौन सुनेगा यहां मेरी फ़रियाद,
कौन देगा मेरे हिस्से का इमदाद?

कभी सोचा था, आसमानों को छुएंगे,
आज ज़मीन पर बेमकसद बैठे हुए हैं।
खुदा से बस यही एक इल्तिजा है,
इंसान की मेहनत को न जाया कर, ऐ खुदा!

काम दो, हुनर को पहचान दो,
इन बेकस नौजवानों को उड़ान दो।
बेरोज़गारी के अंधेरों में एक चिराग़ जले,
हर घर में मेहनत की महक बसे।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर