किताबों का बोझ, दिल पे हर एक तग़ा,
हर पन्ने पे सपने, और रेत का रंगा।
सवेरे का सूरज, जो दूर तक चमका,
लेकिन रात का साया अब तक झुका।
किराए के कमरों में दिन बसर हो रहा,
हर एक सांस में क़र्ज़ का असर हो रहा।
ख्वाहिशें जैसे धुंधली सी तस्वीरें,
मगर भूख का खाली पेट भी कुछ डरातीं हैं।
इश्क़ का लम्हा कभी दिल में जगा,
फिर हालात ने वो रुतबे भी छीने।
कभी सोचा था छोड़ दूं ये सारा सफ़र,
लेकिन मंज़िल की आवाज़ सुई की तरह तंग है।
गिरते-संभलते, लड़ते हर रोज़,
क्योंकि जीने का हौसला यही असली साज है।
आख़िरकार ज़िंदगी है कुछ ख़्वाबों की तरह,
जो थमकर, हौसला भी ज़िंदा रखता है।
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