जिस्म के पिंजरे में कैद है
जिस्म के पिंजरे में कैद है.... रूँह का पिंजर...!
दिल.. के गहरे जख्मो में... धंसा है झूठे रिश्तो का खंजर...!!
अब कोई अरमानो की कली खिलेंगी नहीं... कोई बहार वापस आयेगी नहीं...!
आँखों के दरिया सुख गये.... दिल की जमीं... हो गई बंजर...!!
जी क़रता... मैं आज़ाद हो जाऊँ... हर बंधन से... हर... हर जजीर से...!
मिल जाये मेरे दिल का रांझा... अपने दिल की हीर से.।!!
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