मै रावण कैकसी पुत्र , वेदो का मै ज्ञानी हूँ।
शिव भक्त राक्षस कुल का बहुत बड़ा अभिमानी हूँ।।
शिव भक्ति में हुआ लीन मैने कैलास उठाया था।
अपने बाहु बल से कितनो को मैने हराया था।।
घोर तपस्या कर ब्रह्मा से दशमुख का वरदान लिया।
शिव भक्ति करके मैने सोने की लंका मांग लिया।।
राक्षस कुल का होकर भी चारो वेदो का ज्ञान लिया।
सभी लोग कहते है मुझसे तुमने क्यूं अभिमान किया।।
मै ज्ञानी, नही आभिमानी था, मुझको समझ भी आता था।
मोक्ष पाने के खातिर, शिव से प्रेम जताता था।।
इतना घोर तपस्या का, बस इतना वरदान मिला।।
सिया स्वयंबर में जाकर, मुझको था असली ज्ञान मिला।।
शिव का सबसे बड़ा भक्त, शिव धनुष उठा नही पाया।
धनुष अठाना बहुत दूर, रत्ती भर हिला नही पाया।।
मेरे आराध्य मेरे शिव का, तब मैंने था ध्यान किया।
राम धनुष तोड़े थे तब मैने हरि को पहचान लिया।।
मोक्ष मार्ग तो बहुत दूर, भक्ति से उसे न पाउँगा।
मै राक्षस, मै मलिन, पुष्प को कैसे चढ़ाऊँगा।।
ऐसे कठीन परिस्थति में, मैने खुद पर अभिमान किया।
कुल के उद्धार के खातिर, मैने संकल्प था ठान लिया।।
शुर्पणखा प्रकरण, सिता हरण, ये केवल बहाना था।
मुझको पूरे कुल के साथ,हरि चरणो में जाना था।।
कुम्भकर्ण, फिर इन्द्रजीत, फिर एक-एक का उद्धार हुआ।
मोक्ष मिला हरि चरणो में, मेरा नाव भी पार हुआ।।
तब से अब तक हर वर्ष सबलोग मुझे जलाते है।
अहंकार, अभिमान पर, सत्य को विजय दिलाते है।।
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