आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरी मां

                
                                                         
                            नजर उतारने के सौ तरीके जानती है मेरी मां,
                                                                 
                            
हफ्ते के एक एक दिन यात्रा पर क्या शुभ है, जानती है मेरी मां,
हमे पालने के लिए जो भी सही लगा किया,
हां, पर अपने घमंड को स्वाभिमान समझती रही मेरी मां।

जब हम नींद में रहते तो नाभि में काजल लगाती, दशहरे में,
जागने पर नाभि का काजल नही पर, आंखो मे स्याह रंग नजर आता था,

जादू टोने से कुछ इस तरह बचाती थी , मेरी मां।
बातें बदलकर बाबूजी के गुस्से से बचाती थीं,
महीने में चार बार नजर उतारती थीं,
ज्वर में सारी रात पंखे झलती,
माथे पर बिना रुके झंडू बाम मलती

मां सिर्फ शब्द नहीं, प्यार, समर्पण, त्याग है,
संसार का सबसे पवित्र रिश्ता है, मां।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर