अपने हिस्से की तरकारी,
दे देती थी मुझको सारी,
पंखे झलती रात रात भर,
कभी थकी ना कभी वो हारी,
जीवित पुत्रिका व्रत में रहती,
सारे दिन उपवास बिचारी,
बाबूजी जब गुस्सा होते,
लड़ती ऐसे जैसे कटारी,
हृदय विगलित हो जाता है,
याद आती जब त्याग तुम्हारी,
मां! तुझसे ही हस्ती मेरी,
तुम हो मंदिर, मैं हूं पुजारी।
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