शीशे का घर, पत्थरों का शहर,
जिन्दगी गुमशुदा, जीना भी यहां है दुभर,
मझधार में नईयां, लहरों का कहर,
अनजाने संशय में रहता है मन, दुस्वारी में कटता है एक एक पहर,
हालात ही कुछ ऐसे हैं, कौन किसकी ले खबर,
मर्ज जब हद से गुजर जाए, हर दवा होती बेअसर,
खोट हर दिल में भरा है,
कौन किसकी ले खबर,
हर किरदार है डूबा खुद में, एक दूजे से है सब बेखबर,
तख्त पर रखें चराग जलते है शब भर,
ऐसे ही बीतेगा अब, जिंदगी का सफर।
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