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गांव का मकान

                
                                                         
                            बाट जोहता है, कोई आए यह पे,
                                                                 
                            
खंडहर बना, है सब अनजान,

बरसों पुराना, गांव का वो मकान।

मकड़ियों के जाले, किवाड़ें हैं टूटी,
टपकती छतों से है, बरसात फूटी,

दिन में अंधेरे, उदासी के घेरे,
हुई रात जैसे कोई श्मशान,

बरसों पुराना गांव का वो मकान।

रिसती दीवारें, जैसे बिरहन पुकारे,
खामोश रातें, हैं करती आह्वान,

कोई तो दिला दे पुरानी वो शान।

बरसों पुराना गांव का वो मकान।

सूनी सी चौखट पे सूखे वो पत्ते,
चौके में चूल्हे उदासी से रोते।

कमरों में छत ना, बचा आसमान,
बरसों पुराना गांव का वो मकान।
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एक वर्ष पहले

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