जहां से हम आए वहीं को है जाना,
दो दिन की दुनिया, मुसाफिरखाना।
ये वक्त का दरिया,
चला जा रहा है,
सभी को पता है कहां जा रहा है,
है गिनती के दिन ये,
खुशी से बिताना,
दो दिन की ये दुनिया, मुसाफिरखाना।
जिन रास्ते से गुजरे,
वो रस्ते बताए,
चला इन पे कोई है, अल्हड़ दीवाना।
दो दिन की ये दुनिया, मुसाफिरखाना।
इक ऐसी हो हस्ती,
नगर जाने बस्ती,
कोई चाहे भी तो,
हो मुश्किल भूलना,
दो दिन की दुनिया, मुसाफिरखाना।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X