कर ली बहुत गुस्ताखियाँ
ज़मीं पर,
बेपरवाह आसमाँ में
उड़ना चाहता हूँ।
भीड़ में हो गई काफ़ी
भागम-भाग,
अब खुद में कुछ वक़्त
ठहरना चाहता हूँ।
करके देख लिया
दुनिया से खूब तकरार,
अब शांति से दो पल
बैठना चाहता हूँ।
जवानी हसरतों को
पूरा करने में गुजरती जा रही है,
बचपन को अपने
मैं फिर से जीना चाहता हूँ।
दिन की चकाचौंध से
रोज़ रूबरू होना होता है,
आज रात के अँधेरे में
खुद को ढूँढना चाहता हूँ।
मन बावरा है,
कहकर संभाल लेता हूँ होश को,
इस बार बदहोशी में
खुद को देखना चाहता हूँ।
जागना अच्छा लगता है
दिल-ए-गुलज़ार में,
नींद में भी
खुद से मिलना चाहता हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X