छाया तुमको देता
फल फूल हवा तुमको देता
निर्दय की तरह काटते हो
तुम ऑक्सीजन कहां से पाते हो?
अरे जालिमों,मैं जो देता स्वच्छ हवा
तुम पंखे से वो पा सकते नहीं
इमारत खड़ी कर रहे हो बड़े बड़े
मेरा नाश करके तुम पछताते नहीं
तुम्हारा शायद आ गया है बुरा समय
इसलिए तुम अंधाधुंध कर रहे हो मेरा छय
मेरे बिना कौन तुम
अपना विकाश कर लोगे
मैं कहता हूं तुम अपने
जीवन का सर्वनाश कर लोगे
मोह नहीं आता तुम्हें,नहीं तुम्हें तरस आती
कसाई की कुल्हाड़ी से काटते वक्त
दया तुम्हें नहीं आती
मेरे बिना एक दिन तुम घुट घुट के मरोगे
स्वच्छ हवा के लिए खून के आंसू रोओगे
दर्द मैं अपना बयां करता
अगर तुममें मनुष्यता होगी तो समझ जाओगे
अन्यथा, तुम अपने ही हाथों अपना विनाश कर लोगे
मैं जीता जागता पेड़ हूं
काश, तुममें विवेक होता
मैं तुम लोगों से डर डर कर नहीं जीता
होने के लिए तो, मैं फरिश्ता से भी बड़ा हूं
दिन रात निस्वार्थ भाव से तुम सब के लिए खड़ा हूं
एक गुहार लगाता हूं मुझसे भी प्यार कर लो
मैं पेड़ हूं मत काटो मुझे।।
-ममता तिवारी
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