मन के गहरे सागर में उतरकर
दिल के कोने में बैठे
सन्नाटे से मेरी आँखें चार हुई
मन में एक अनजानी
आहट हुई
जैसे वर्षों से बंद दरवाज़े पर
किसी ने दस्तक दी हो
कुछ उम्मीदें कुछ सपने
आज भी उसी लिबास में
अंदर ही अंदर सांस ले रहे
मेरी धड़कने थमने लगी
स्तब्ध निशब्द
उनके करीब आते गई
जैसे वो कई वर्षों से
आंखे बिछाए कुछ
नर्म लबों से कहने के लिए
व्याकुल आतुर बैठें हों
मेरी भी सांसे तेज़ होने लगी
जैसे मुझसे कोई खताएं हुई हो
आहिस्ता-आहिस्ता करीब गई
सकुचाते हुए
लफ्ज़ों को ज़ुबान देने की हिमाकत की
उनके मन को छूने की कोशिश की
स्पर्श पाते ही
उनमें ख़ुशी की तरंगें उठने लगीं
जैसे उनमें फिर से
हिम्मत और जान आ गई हों
कई सदियों से दफ़न
उम्मीदों और सपनों से
खुलकर रूबरू हुई
सपने उम्मीदें हँसने लगे
मन ही मन खुश होने लगे
जैसे उनके उम्मीदों को
उड़ान मिल गई हों
जीने की अरमान मिल गई हों
हम सभी के मन में कुछ
सपने उम्मीदें आस लगाकर
बैठें रहते हैं
जिन्हें नज़र अंदाज कर देते हैं
हमें अपने मन के अंदर झांकना चाहिए
सपने चाहे पढ़ने लिखने की हों
या कुछ मुकाम हासिल करने की हों
या सबके चेहरे पर मुस्कान सजाने की हों
हमें अपने सपनों को जरूर पूरा करना चाहिए
और हक़ीक़त में बदलना चाहिए।।
-ममता तिवारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X