एक युद्ध मन में भी चलता सदा
निकल न पाता इंसान इससे कभी
सीने में जैसे हरदम
तीर चुभता नुकीली कोई
इंसानों की विवशता बड़ी
हर राह पर मुश्किल खड़ी
खुद के अंदर भी एक जंग
हर युग में इंसानों को लड़नी पड़ी
जो न घबराता इससे कभी
विजय की माला पहनता वही
जीत जाता जो जंग खुद से
शूरवीर कहलाता वही
हार तो स्वीकार नहीं
निडर निर्भीक मानव बनेंगे
मानव रूप में जन्म मिला है
एक युद्ध खुद से भी करेंगे।।
-ममता तिवारी
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