लोगों ने पूछा कि "मैं कौन हूँ?
मैंने कहा कि क्या बताऊँ
इक बेरोजगार हूँ।
कामधाम कुछ रहा नहीं
गैरों के दुख बाँटा करता हूँ
सुनकर किस्से लोगों के
खुद का भूल जाता हूँ।
बड़ा शुकून मिलता है सच में
जब किसी के काम आता हूँ।
कितना खुद का खापीकर
इतने लोगों को मैं समझाऊँ
वो तो भला हो योगी मोदी का
दे देते हैं कुछ गेहूँ चावल
जो अक्सर बेच आता हूँ।
मेरी भी कोई बड़ी गलती नहीं है
यह तो सभी लोगों के किस्से हैं
मैं ने तो अपना लिख दिया
उनके भी कुछ हिस्से हैं।
पढ़कर सुनकर दिल द्रवित
अक्सर हो जाता है।
मेरे पास कुछ होता नहीं
चाहकर भी किसी को मैं
मदद करता नहीं।
बस लिख लेता हूँ दोचार लाइने
और लोगों को सुना देता हूँ।
उमर भी ढली जा रही है
भूतपूर्व यूवा हूँ अभी मैं
बूढ़ा तो कह सकता नहीं
कलम के जोर पर हमेशा
कारगिल युद्ध लड़ता हूँ।
माफ करना दोस्तों
अगर कोई गलती दिखे
खींच देना टाँगें मेरी
कोई गलती से जो
मुझे कवि कहे।
मैं फटेहाल एक साहित्यिक
पुजारी खुद को समझता हूँ
उससे बड़ी औकात नहीं
जो खुद को हनीप्रीत का
रामरहीम कहूँ।
बेरोजगार हूँ मैं इसलिए
बेकार की बाते लिखता हूँ
पढ़कर किसी को समझमें
थोड़ा सा भी आ जाये
समझूंगा उस दिन मेरा लिखना
साकार हुआ।
शून्य था अभी तक
आज आसमान का चाँद हुआ।
खाली दिमाग में इधर उधर की
उल्टी सीधी बातें चलती हैं
कब किसको औरों के दुख को
सुनने की की टाइम मिलती है।
ये तो कवि हृदय होता है ऐसा
जो दुनिया को देखकर चलता है
लोगों के अश्रु को कलम चलाकर
मोती सा चमकाता है।
मेरा बस नहीं चलता है मुझपर
मैं मजबूर हूँ लेखनी से
सच्चाई को लिखते रहने में
खुद का मान समझता हूँ।
बेशक कोई बड़ा कवि नहीं
पर छोटा ही सहीअभिमानी हूँ।
क्या फायदा मैं भी वैसा ही लिक्खूँ
जैसा अक्सर लोग लिखा करते
फिर मेरे उनमें फर्क कहाँ
जो मैं भी वैसा ही बन जाऊँ।
ऐ साहित्य के प्रेमियों
क्या मुझे वह मान दोगे
मालचन्द कनौजिया को थोड़ा सा
सम्मान दोगे
मैं बेपनाह हूँ, आजतक
कबसे दोदो लाइन लिखता हूँ
कभी काव्य के मंच पर तो
कभी रद्दी में फेंका दिखता हूँ।
--- मालचन्द कनौजिया बेपनाह
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