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माई हम नाहीं जैहैं पनियाँ भरन...

                
                                                         
                            माई हम तो गई थी पनियाँ भरन।
                                                                 
                            

मारग में मिल गये मुरली धरन।

एक पैर से खड़े, बांकी थी चितवन।

कटि थी तिरछी कटि में करधन।

माई शोभित मुरली उनके अधरन।

हम भूल गई माई पनियाँ भरन।

माई छूट गये घट गिर गए धरनि।

माई हम नाहीं जैहैं पनियाँ भरन।।

© कवि : अशर्फी लाल मिश्र ,अकबरपुर ,कानपुर।
 
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5 वर्ष पहले

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